पांवटा साहिब — नागेन्द्र तरूण की कलम से :— चुनाव सिर पर है तो सोचा शहर की डाइनामिक महिला से मुलाकात कर चाय की चुस्की ली जाय और उनके बारे में जानने का प्रयास किया जाए। तो बीते दिनों भैट हुई वार्ड नम्बर 5 की पूर्व पार्षद हरविन्दर कौर से। हालांकि चाय तो मिल नही सकी किन्तु बातो बातो में इतनी बाते हुई कि सुबह से दोपहर हो गयी और बाते खत्म नही हुई।
बातो बातो में पता चला कि हरविन्द्र कौर की प्रारम्भिक शिक्षा दीक्षा हरियाणा के गांव इन्द्री में हुई। पढाई लिखाई का जुनून बचपन से ही सिर पर सवार था तो लगातार पढती रही और दो बार स्नातकोत्तर की शिक्षा ग्रहण की उसके बाद शादी हो गयी और किन्तु शादी से पूर्व ही एमफिल की डिग्री हासिल कर ली थी। पढने मे तेज तर्रार और तीक्ष्ण बुद्धि की मालकिन थी मां सरस्वती की विशेष कृपा होने के साथ साथ निर्भयता के साथ सौम्यता और कर्मठता की पर्याय बन गयी।
मार्च 1993 में शहर के शिक्षित अध्यापक चन्द्रजोत सिंह के साथ विवाह सिख रीति रिवाज के अनुसार सम्पन्न हुआ। सेवाभाव बचपन से ही कूट कूट कर भरा हुआ था। जट सिख परिवार से ताल्लुक रखने वाली महिला हरविन्दर कौर गरीबो, मजलूमो, और असहायो की मदद में अपना पांव तुरन्त उठाकर चलने में देरी नही करती। और तहेदिल से मदद करने में कोई कोर कसर भी नही छोडती। तो उन्होने पूछने पर बताया कि इस प्रकार की समाज सेवा से उनके दिल को सकून मिलता है और मन को शान्ति।
बेशक किसी राजनैतिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक नही रखती थी किन्तु शादी के बाद जन सेवा और समाज सेवा करने की दृढ इच्छा थी तो जैसा ससुराल मिला जिस मानसिकता का मिला उसी मे रम गयी और कांग्रेस पार्टी की विचारधारा में तल्लीन हो गयी। इनको कभी भी किसी पद की लालसा नही रही किन्तु अपने दम पर अपनी सौम्यता, कर्मठता व्यवहार कुशलता के चलते दो बार चुनाव जीती किन्तु जब चेयरमैन की कुर्सी की दावेदार होने लगी तो अपनेा ने ही कुल्हाडी चला दी यहां वही पुरानी पक्तियां याद करवाते चले कि….. गैरो में कहां दम था मेरी कश्ती वहां डूबी जहां पानी कम था।
याद करवाते चले कि 2011 व 2016 में वार्ड नम्बर 5 से पार्षद रही उसके बाद डीपीसी के चुनाव में भी बाजी मारी और दो मतो से विपक्ष को पटखनी दी। इतना सब कुछ होने के बावजूद भी जो शौक थे वह बरकरार रखे जिसमें मुख्यतया खाना बनाना विभिन्न किस्म के व्यंजन बनाना संगीत सुनना आदि आदि प्रमुख शौक रहे किन्तु इसके बावजूद भी अपने घर परिवार की जिम्मेवारियो का निर्वहन अपना सर्वस्व न्यौछावर करते हुए किया और वर्तमान में अपने इकलौते घर को चिराग को डाक्टर की उपाधि दिलवाकर ही चैन की सांस ली और अब ये दम्पत्ति बेटे के डाक्टर बनने के बाद थोडा सुकून महसूस कर रहे है।
और जब उनसे चुनाव के बारे में चर्चा की तो उन्होने बताया कि मै तो चुनाव की इच्छुक नही हूं। घर परिवार देखना है बेटे की शादी का भी समय है किन्तु वार्ड के उनके मतदाता, उनके चाहने वाले लगातार और बार बार फोन कर रहे है कई मर्तबा अपने अपने घरो पर बुलाकर दवाब बना रहे है। औरचुनाव लडने और ना लडने की बात को वे गोल मोल कर गयी